लोकवादी आलोचना को बताये


        जिस आलोचना पद्धति में आलोचक लोक धर्म, लोकमंगल, लोक मर्यादा आदि प्रतिमानो को आधार बनाकर आलोचना के प्रतिमान स्थापित करता है, उसे लोक वादी समीक्षक कहा जाता है| इन आधारों एवं इन कसौटीयो पर ही आलोचक सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक आलोचना करता है| इस पद्धति के प्रमुख आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं उनकी रचना "लोकमंगल की साधना अवस्था एवं लोकमंगल की सीधा अवस्था" है| आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हीं प्रतिमनो के कारण लोकवादी समीक्षक कहे जाते हैं|

ऎतिहासिक एवं सांस्कृतिक आलोचना


       इस आलोचना पद्धति में सबसे प्रमुख योगदान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है| ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक आलोचना में किसी कृति का मूल्यांकन इतिहास एवं संस्कृति की परंपरा एवं उसके व्यापक आधारों के आधार पर की जाती है| ऐतिहासिक आलोचना के अनुसार किसी मानव अथवा मानव समुदाय की चेतना विभिन्न प्रकार के परिवेश एवं देशकाल को बदलने के बावजूद भी किसी एक निश्चित परंपरा से जुड़ी हुई होती है| इसी प्रकार सांस्कृतिक आलोचना, व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में किसी कृति का मूल्यांकन करता है| और संस्कृति के साथ उसके महत्व को जोड़कर देखता है, जैसे आचार्य द्विवेदी अपनी पुस्तकों "हिंदी साहित्य की भूमिका", "हिंदी साहित्य का आदिकाल", "कबीर" के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य की परंपरा को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं जातीय तत्वों से जोड़ा और यह भी बताया कि वर्तमान हिंदी साहित्य हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक भी है| द्विवेदी जी प्रथम आलोचक थे जिन्होंने कबीर को हिंदी साहित्य में प्रमुख स्थान दिलाया| द्विवेदी जी के अतिरिक्त विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, परशुराम चतुर्वेदी आदि प्रमुख आलोचक इस श्रेणी में गिने जाते हैं|

हिंदी कहानी के उद्भव और विकास

हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
           हिंदी कहानी का उद्भव और विकास आधुनिक काल में होता है| कहानी आधुनिक गद्य विधा है| प्रारंभिक दौर में कहानियां रहस्य और रोमांच से भरपूर  थी साथ ही उसमें मनोरंजन के तत्व अधिक थे, परंतु धीरे-धीरे कहानियां यथार्थ से जुड़ने  लगती हैं| हिंदी कहानी के समूचे विकास क्रम को प्रेमचंद को केंद्र में रखकर बांटा जा सकता है| जैसे -आरंभिक हिंदी कहानियां या प्रेमचंद पूर्व युग ,प्रेमचंद युगीन  हिंदी कहानी, प्रेमचंद उत्तर हिंदी कहानी, स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी  तथा समकालीन हिंदी कहानी|

समकालीन कहानी को परिभाषित करें

समकालीन कहानी
  समकालीन का अर्थ है, आज के दौर की कहानियां यह वह कहानियां है| जो आज के समय में एवं आज की परिस्थितियों से साक्षात्कार कराती  है| यह अपने समय के यथार्थ को पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत करती है| एवं इनमें कोई पूर्वाग्रह नहीं होता है यहां  पर या भी मायने रखता है| कि समकालीन लेखक अपने समय के सवालों के प्रति कितना गंभीर है,  मधुरेश यह कहते हैं:- समकालीन होने का अर्थ है समय की व्यावहारिक और रचनात्मक दबाव को झेलते हुए उन से उत्पन्न तनाव और टकराहटो के बीच अपनी सृजनशीलता द्वारा अपने होने को प्रमाणित करना। समकालीन लिखक की पहचान यही  हो सकती है,  कि अपने समय के सवालों के प्रति वह किस तरह की प्रतिक्रिया करता है और लेखक में उन सवालों के लिए जो जगह वह निर्धारित रहता है,  उन सवालों के प्रति वह कितना गंभीर है कहीं ना कहीं इन सब से ही उसकी समकालीनता  सुनिश्चित  होती है ।

सक्रिय कहानी क्या है

सक्रिय कहानी
     राकेश वर्षिक के द्वारा शुरू किया गया था। उन्होंने अपनी पत्रिका मंच 79 के माध्यम से सक्रिय कहानी आंदोलन को प्रस्तुत किया। इस कहानी के कहानीकार जिन्होंने इस आंदोलन में पूर्ण सहयोग दिया चित्रा मुद्गल, रमेश बत्रा, स्वदेश दीपक आदि हैं। यह वह दौर था जब की साहित्य जगत में आम आदमी के संघर्ष को दिखाया जा रहा था। जबकि राकेश वत्स से अब इस आंदोलन में उस आम आदमी के संघर्ष की के सक्रिय एवं संगठित करते हुए प्रस्तुत करते कर रहे हैं। सक्रिय कहानी की अवधारणा पर रख राकेश वत्स लिखते हैं " सक्रिय कहानी का सीधा मतलब है आम आदमी के चित्रात्मक ऊर्जा और जीवंतता की कहानी। उस समाज, एहसास और बोध की कहानी जो आम आदमी की वेवसी वैचारिक निहत्थेपन एवं नपुंसकता से निजात दिल कर पहले स्वयं अपने अंदर की कमजोरियों के खिलाफ खड़े होने के लिए खड़ा करने की जिम्मेवारी अपने सिर पर लेते हैं"। यह कहानी आंदोलन संघर्षरत मनुष्य के शोषण से मुक्ति दिलाना चाहता है|और शोषण से यह मुक्ति हैं चरण परिणीति है| सक्रिय कहानी के प्रमुख कहानी रमेश बत्रा की जंगली जुगराफिया, कुमारसंभव की आखरी मोड, राकेश वत्स की काले पेड़, सुरेंद्र सुकुमार की उनकी फैसला जैसी कहानियां हैं। यह कहानी आंदोलन शुरुआती चरण में अपनी पहचान तो कर पाता है, किंतु लंबे समय तक नहीं चल पाता है क्योंकि, इसमें वैचारिकता तो है लेकिन, रचनात्मकता का आकलन नहीं है।

समान्तर कहानी किसे कहते है

समान्तर कहानी 

सचेतन कहानी की बाद हिंदी में और अकहानी और सहज कहानी आंदोलन भी हुआ। कहानी के विभिन्न आंदोलनों ने साहित्य के विभिन्न मूल्यों में बांट दिया। और कहानी अपने मूल गंतव्य से हट गई उस यथार्थ को प्रस्तुत नहीं कर पा रही थी, जिसको लेकर कहानी ने अपनी विकास यात्रा प्रारंभ की थी। आठवीं दशक में कमलेश्वर ने सारिका पत्रिका का संपादन कार्य आरंभ किया उस दौर में लोग आंदोलन के गुट बंदी से आदि अजीज आ चुके थे। उस दौर में कमलेश्वर ने लोगों से वादों से मुक्त होकर कहानी लिखने की बात कहीं कहानी के संदर्भ में वे प्रतिबद्धता को भी नकार देते हैं। और यह भी आवाहन करते हैं कि यह समांतर कहानी पीढ़ी मुक्त कहानी होगी अर्थात सभी उम्र एवं विचारधारा के लोग एवं लेखा को को के साथ मंच साझा करने की बात कही गई। समांतर कहानी के केंद्र में आम आदमी के संघर्ष पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया जाता है। समांतर कहानी नए मनुष्य एवं समाजवादी समाज की स्थापना  के संदर्भ में आम आदमी की चिंता को अपने केंद्र में रखकर चलने की दावा प्रस्तुत करती है। यह वह दौर था, जब पूरे देश में जन आंदोलन हो रहे थे, इंदिरा गांधी एक तानाशाही सरकार भी चला रही थी और जन आंदोलन को कुचल रही थी, इसी दौर में जी पी का संपूर्ण क्रांति का आंदोलन भी हो रहा था, आम आदमी हाशिए पर पड़ चुका था। उसी दौर में कमलेश्वर सरिका पत्रिका के संपादकीय में लिखते हैं "इतिहास जब नंगा हो जाता है तो संपूर्ण संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है यह पूरा देश एक भयंकर दल बन चुका है और इसे दलदल बनाने वाले लोग परकोटो पर जाकर  बैठ गए हैं और दलदल में फंस गए आम आदमी मरण का उत्सव मना रहे हैं " अपने संवेदनशीलता के माध्यम से कमलेश्वर क्रांति के लिए ये तैयार खड़े दुविधा रहित आम आदमी के बातचीत को कह रहे हैं ।समांतर कहानी आंदोलन में सारिका पत्रिका में समांतर कहानी विशेषांक प्रकाशित होता है इस विशेषांक में भीष्म साहनी के वांग्चु, हृदयेश की गुंजल्क, मणि मधुकर की विस्फोटक जैसी कहानियां प्रकाशित होती है। इस प्रकार कहानी में समांतर कहानी के आंदोलन शुरू हो जाता है इतना ही नहीं समांतर कहानी विशेषांक के रूप में विभिन्न भाषाओं की समांतर कहानी की विशेषांक निकाले गए। और साथ ही देशभर में समांतर कहानी पर गोष्ठी का आयोजन किया गया है। और समानांतर कहानी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया गया। इन कहानियों का केंद्र बिंदु आम आदमी का जीवन संघर्ष है और मनुष्य नए युग के नए प्रश्नों का सामना कर रहा था यह मनुष्य जो संघर्ष रत्न है, नए मूल्यों की स्थापना के दिशा में भी प्रयासरत है। और इस आम आदमी के संघर्ष को संपूर्णता के साथ प्रस्तुत करना कि समांतर कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसके अन्य प्रमुख:- कहानीकार गोविंद मिश्र, जितेंद्र भाटिया, इब्राहिम शरीफ, हिमांशु जोशी, स्वदेश दीपक आदि| प्रमुख कहानियों में सतीश जायसवाल कि जाने किस बंदरगाह पर, कमलेश्वर की जोखिम, जितेंद्र भाटिया की शहादत नामा, पाल भसिम कि सौदा, जैसी कहानियां प्रमुख है। समांतर कहानी वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था, जिसने भारतीय कथा साहित्य में पुनः आदमी को स्थापित कर दिया और कहानियों को आम आदमी के संघर्ष से जोड़कर नए तेवर एवं नए हलचल पैदा कर दिए।
सक्रिय कहानी

अकहानी

अकहानी
अकहानी नई कहानी की विद्रोह में जन्म लेने वाला एक आंदोलन था| नई कहानी की भोगे हुए यथार्थ एवं अनुभव की प्रमाणिकता जैसे नारों के विरुद्ध सशक्त करवाई होती है| उसे अकहानी में देखा जाता है| इस आंदोलन पर फ्रांस के एंटीस्टोरी का प्रभाव है| इसके साथ-साथ अस्तित्व वादी चिंतक के शास्त्र कामू के दर्शन का भी पर्याप्त प्रभाव दिखाई देता है|और अकहानी आंदोलन कथा के संं स्वीकृत आंदोलन का अस्वीकार कर देता है और इसमें बड़े ही तन्मयता के साथ मनुष्य की पीड़ा, कुंठा, अजनबी व्यर्थाताबोध को चित्रित किया गया है| और मनुष्य की यथार्थ चेतना को भी नए परिपेक्ष में परिभाषित करने का प्रयास किया गया है| वास्तव में यह वह दौर था जब पुराने जीवन मूल्य बिखरने लगे थे|आम आदमी की हताशा बढ़ने लगी थी| और रोजी रोटी की तलाश में जब वह हारता है तो कुंठित एवं शूद्र होने लगता है|वह दौर था जब हिंदी में अकविता की दौर भी शुरू होता है|
अकहानी के प्रमुख कहानीकार:- जगदीश चतुर्वेदी, राजकमल चौधरी, रवींद्र कालिया,ममता कालिया, दूधनाथ, मुद्राराक्षस आदि हैं| इन सभी कहानीकारों ने अपने समय के यथार्थ को पूरी तन्मयता के साथ प्रस्तुत किया है| और कहानियों में मनुष्य की पीड़ा, कुंठा मनुष्य के विघटन की त्रासदी, परेशानी को पूरी मार्मिकता के साथ अंकित किया है| यदि कहानी की दृष्टि से देखा जाए तो दूधनाथ सिंह की रक्तपात, श्रीकांत वर्मा की शव यात्रा, रवींद्र कालिया के सिर्फ एक दिन, राजकमल चौधरी की अग्नि स्थान ,एक अजनबी के लिए एक शाम जैसी कहानियां जैसी कहानियां प्रमुख हैं|
     अकहानी आंदोलन में मनुष्य के कुंठित काम को भी पूरी यथार्थाता के साथ प्रस्तुत किया| कहानीकारों ने काम विकृतियों को चित्रण करते हुए उन्मुक्त यौन संबंधों को भी वकालत की है| इस प्रकार के प्रमुख कहानीकार राजकमल चौधरी और जगदीश चतुर्वेदी हैं अकहानी की सबसे बड़ी सीमा यह भी मन जाती है| साहित्यकार कमलेश्वर धर्मयुग में ऎयासो प्रेत विद्रोह लिखते हैं| और उसमें कहते हैं कि हिंदी कहानी अपनी मूल्य से भटक गई है|अकहानी आंदोलन का शिल्पी भी अपने संवेदना के कारण एक विशिष्ट स्वरूप में उभरता है| इसमें जो नए प्रयोग किए गए वह लोगों को अपनी ओर  आकर्षित भी करता है| इन कहानियों में कथा तत्व न के बराबर है|और जिन कथा का वर्णन है, वह असत्य और व्योरबार है| इन कहानियों में सूक्ष्मता का तत्व अधिक है| और इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ता है की कहानी उत्तरोत्तर जटिल होती जाती है| और कथा रस गायब हो जाता है|वस्तुतः कहानी आंदोलन अपनी सीमाओं के बावजूद अपने समय को प्रभावित करती है| और मनुष्य के अधिकार को आधार बनाकर साहित्य में आंदोलन के रूप में जन्म लेती है|

सहज़ कहानी किसे कहते है


सहज कहानी
  सहज कहानी आंदोलन अमृत राय के द्वारा शुरू किया गया था| इसके मूल्य में यह उद्देश्य था कि कहानी की खोई हुई सहायता को फिर से बहाल किया जाए उसे सहेजा जाये| सहरसा का व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं:-" मोटे रूप में इतना ही कह सकते हैं कि सहज वह है- जिसमें आडंबर नहीं है, बनावट नहीं है, ओढ़ा हुआ  मैनरिज्म नहीं है या मुद्रा दोष नहीं है, आईने के सामने खड़े होकर आत्मरती के भाव से अपने ही यंग प्रत्यंग को अलग अलग कोणों से निहारने का मोह नहीं है, किसी का अंधाअनुकरण नहीं है" वस्तुतः अमृतराय अपने इस आंदोलन के माध्यम से सादगी के सौंदर्य शास्त्र को कहानी में स्थापित करना चाहते थे| यहां ध्यान देने की बात है कि अमृत राय प्रेमचंद्र के पुत्र हैं उनका सारा जोर कहानी को सहज एवं प्रभावित करने पर था| परंतु यह आंदोलन अधिक नहीं चल पाया है|

नई कहानी


नई कहानी:-
      आजादी के बाद नई कहानी आंदोलन का जन्म होता है| इस आंदोलन में कहानी के परंपरागत प्रतिमान को नकार दिया और स्वयं के मूल्यांकन के लिए अपनी नई कसौटी तय की|  नई कहानी में नई शब्द कहानी से नई को अलग करने के लिए प्रयोग नहीं हुआ है| बल्कि यहां नई से तत्पर है- नई संवेदना, नई दृष्टि, नया शिल्प यदि नई कहानी आंदोलन के युगबोध को देखा जाए तो यह लगभग 19 से 50 से 60 के दौर को दर्शाता है| आजादी के बाद लोगों के मन में नए सपने थे उस समय देश में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना हो रही थी, कल कारखानों की स्थापना हो रही थी, पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा देश की आर्थिक विकास की नीतियां तय की जा रही थी| यह वही दौर था जब कि समाज में मध्य वर्ग अपनी आकांक्षाओं को संजोकर आगे बढ़ना चाह रहा था| आजादी के बाद समाज में व्यापक परिवर्तन के फल स्वरुप पुराने रिश्तेदारीया टूट रही थी, परिवार का परंपरागत ढांचा ढह रहा था, स्त्री-पुरुष के संबंधों में भी बदलाव आ रहा था, दलितों और वंचितों में भी नई उम्मीदें जग रही थी| क्योंकि उन्हें सामान मताधिकार प्राप्त हुआ था, परंतु 1960 तक पहुंचते-पहुंचते पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों में बिखराव होने लगता है, ऐतिहासिकता से मोहभंग होने लगता है, मध्य वर्ग का जीवन कठिन हो जाता है, नैतिक व सामाजिक मूल्यों का पतन होने लगता है, यहां पंचशील सिद्धांत भी लगभग विफल होने लगता है| यह सभी नई कहानी का विषय बनते हैं| और कथानक में भी स्थूलता के स्थान पर सूक्ष्म तत्वों की प्रधानता होने लगती है| इसी प्रकार शिल्प के स्तर पर  प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता, बिंबात्मकथा की प्रधानता होने लगती है नए कहानीकार अपने कहानी की मूल्यांकन की नई कसौटीया तय करते हैं| नामवर सिंह ने कहानी नई कहानी पुस्तक के माध्यम से इसे व्यापक कलेवर प्रदान किया|
इस युग के प्रमुख कहानीकार :- नई कहानी में प्रमुख रूप से राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, और कमलेश्वर का नाम अधिक प्रसिद्ध है| यह आंदोलनकारी बदले हुए यथार्थ और नए अनुभव संबंधों की प्रमाणिक अभिव्यक्ति पर बल देते हैं| इनके अनुसार नए कहानीकारों ने परिवेश की विश्वसनीयता, अनुभूति की प्रमाणिकता और अभिव्यक्ति की ईमानदारी का प्रश्न उठाया है| और यह भी बताया है कि नई कहानी का मूल उद्देश्य पाठक को उसके समकालीन यथार्थ से परिचित करवाना है| नई कहानीकारों में फणीश्वर नाथ रेणु, हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी, उषा प्रियंवदा, धर्मवीर भारती, मनु भंडारी, निर्मला वर्मा, शैलेश मटियानी आदि हैं|इन कहानीकारों ने नई कहानी के आंदोलन में अपने युगीन यथार्थ की मार्मिक एवं प्रमाणिक अभिव्यक्ति की है| राजेंद्र यादव ने एक दुनिया समानांतर नामक पुस्तक का संपादन करके नई कहानी का प्रमाणिक संग्रह प्रस्तुत किया है| कुछ प्रमुख कहानियों:- में अमरकांत की जिंदगी और जोंक, उषा प्रियंवदा की मछलियां, मनु भंडारी की यही सच है, मोहन राकेश की एक और जिंदगी, राजेंद्र यादव की टूटना आदि प्रमुख हैं| नई कहानीकारों में फणीश्वर नाथ रेणु ने एक आंचलिक कथाकार के तौर पर अपनी पहचान  बनाई ह|  तो निर्मल वर्मा ने शहरी जीवन के अकेलेपन को संत्रास तथा कुंठा को अभिव्यक्त किया ह| इसी प्रकार अमरकांत ने शहरी मध्यवर्ग के सुख-दु:ख, शोषण तथा अन्याय को पूर्ण  मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है|
     नई कहानी के बाद 1960 से 70 के बीच विभिन्न कहानी आंदोलनों का जन्म होता है| यह वह दौर था जब की नई कहानी के मूल्य और शिल्प अपनी चमक खोते जा रहे थे विभिन्न प्रकार की रूढ़ियों में फंसकर नई कहानी धीरे-धीरे निस्तेज होती जा रही थी| नई कहानी देश और समाज की असफलताओं कमियों को इस रूप में नहीं प्रकट कर पा रही थी| जिससे आम आदमी की पीड़ा सही रूप में व्यक्त हो सके सातवें दशक तक आते-आते पंचवर्षीय  योजनाएं एवं पंचशील सिद्धांत भी विफल हो चुके थे |राजनीति का स्तर पर नैतिकता और मर्यादा लगभग छीन-बिन हो चुके थे| दलों का टूटना बिखरना कुछ इस इस रूप में हो चुका था, जिससे राजनैतिक आदर्शों को भी प्रभावित करना शुरू किया| इस दौर में इसका प्रभाव साहित्य जगत पर भी पड़ता है| विभिन्न साहित्यकार भी अपने अपने घडो की लामबंदी करने लगते हैं| एक घड़ा घडा दूसरे घड़े को प्रभावित करने के लिए साहित्यिक गोष्टी का सहारा लेने लगते हैं| इस सबके बीच सातवें दशक में कई कहानी आंदोलन का जन्म होता है| जैसे- सचेतन कहानी, अकहानी कहानी, सहज कहानी आदि|

जनवादी कहानी क्या है

जनवादी कहानी

  जनवादी कहानियों का दौर 1980 के बाद शुरू होता है। सन 1982 में दिल्ली में जनवादी लेखक संघ की स्थापना होती है। और इसकी स्थापना के बाद से इस कहानी आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है किंतु यह भी ध्यान रखने की बात है कि, हिंदी साहित्य में जनवादी की अवधारणा कोई नई अवधारणा नहीं है। इसकी शुरुआत प्रकाश चंद्र गुप्त द्वारा 1933 में प्रकाशित अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य की जनवादी परंपरा" में कबीर से देखते हैं। बाद में इस परंपरा को हुए प्रेमचंद से भी जुड़ते हैं ।और वह कहते हैं कि प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की जब स्थापना करते हैं| तो उसकी मूल में जन ही था इस पृष्ठभूमि में प्रेमचंद के बाद निराला, यशपाल, रांगेय राघव, शेखर जोशी को रखते हैं। और इस आंदोलन को जो 1983 में खड़ा हुआ था, अचानक खड़ा हुआ आंदोलन नहीं मानते हैं ।जनवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि को उस काल में होने वाले राजनीतिक स्थिति में देखा जा सकता है। कांग्रेस की पराजय होती है। जनता पार्टी की सरकार बनती है जनता पार्टी की सरकार एक व्यापक असंतोष का भी परिणाम थी। इस दौर में विभिन्न राज्यों में भी जन आकांक्षाओं के कारण गैर कांग्रेसी सरकार की गठन होती है। यह सरकार कांग्रेस के विरुद्ध खड़ा होकर अपनी सरकार तो बनाती है किन्तु वर्ग चरित्र के रूप में अलग नहीं थी। अपनी कार्यपद्धती में काफी हद तक शोषक वर्ग के पक्ष में कार्य करने वाली थी, और यही कारण है जनता की आआकांक्षाओं  को पूरा नहीं कर पाती राजनीतिक रूप से गैर कांग्रेसी सरकार को सिर्फ इतना ही है उन्होंने राजनीति में कांग्रेसियों बर्चस्व तोड दिया। साहित्य के स्तर भी यह वह था जब की साहित्य कहानी जैसे आंदोलन आम आदमी के संघर्ष करके संघर्षशील चेतना और वर्ग सुधार के समुची अवधारणा को दूधलाने की कोशिश कर रहे थे। और इसी पृष्ठभूमि में जनवादी लेखक संघ की स्थापना होती है। जनवादी आंदोलन करने का स्वर प्रदान करने का उस दौर के पत्रिका में भी हो रहा था, कोलकाता से कलम, दिल्ली से कथन, मथुरा से उतार्ध, रतलाम से कंक पत्रिका जनवादी कहानी पर चर्चा करना शुरू कर दिए थे। जनवादी का वैचारिक आधार मार्क्सवादी है और अपने मूल प्रकृति में यह जन सम्मान की संघर्ष की पक्षधर है। यह संघर्ष बहूयानी है और जनवादी कहानी में संघर्षरत पात्र अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह से सहज है। संघर्ष की स्थिति में वह निर्णय ले सकता है और अंतिम दम तक संघर्ष करता है। जनवादी कहानी में सर्वाधिक बल सर्वहारा वर्ग एवं मध्यम वर्ग द्वारा किए जा रहे शोषण विरोधी दल पर है। जनवादी कहानियों में जन समस्याओं को सीधी सहज भाषा में सहज शिल्प के साथ प्रस्तुत किया जाता है। जनवादी कहानीकार पूंजीपति वर्ग के कुचक्र और शोषण वर्ग को बेनकाब करता है। और हाशिए पर पड़े मेहनतकश आदमी को निर्णायक संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। जनवादी कहानीकार जन संघर्ष को पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करने पर बल देता है। जनवादी परंपरा के प्रमुख कहानीकार असगर वजाहत, उदय प्रकाश, नमिता सिंह, स्वयं प्रकाश, रमेश बत्रा आदि हैं। प्रमुख कहानियों में असगर वजाहत की मछलियां, स्वयं प्रकाश की सूर्य कब निकलेगा, रमेश बत्रा की जिंदा होने के खिलाफ, विजयकांत की ब्रह्मफांस, उदय प्रकाश की मोसा जैसी कहानियों को देखा जा सकता है।

प्रेमचंद्र उत्त्तर कहानी


प्रेमचंद्र उत्तर कहानी 

       प्रेमचंद्र के बाद हिंदी कहानी कई मायनों में प्रेमचंद्र के यथार्थवादी चित्रण का बहूयामी  में प्रसार करती हुई दिखाई देती है| इस युग में दो अस्पष्ट धाराएं दिखाई देती है-एक प्रगतिशील एवं मार्क्सवादी धारा का नेतृत्व यशपाल कर रहे थे, तो दूसरी मनोविश्लेषण वादी धारा जिसका नेतृत्व इलाचंद्र जोशी, जैनेंद्र और अज्ञेय  रहे थे| ध्यान देने की बात है कि प्रेमचंद की कहानियों में समाजवाद एवं व्यक्तिवादी धारा दोनों ही दिखाई देती है लेकिन, प्रबलता समाजवादी या यथार्थवाद का अधिक है उसी युग में व्यक्तिवादी धारा भी विकसित होती है| जिसका नेतृत्व जयशंकर प्रसाद ने किया प्रेमचंद के बाद दो स्पष्ट धारा यथार्थवादी एवं मनोविश्लेषण के रूप में बट जाती है| यशपाल प्रेमचंद के सामाजिक यथार्थ को मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं| वह अपनी कहानियों में सामाजिक शोषण, विषमता, अन्याय को विषय बना कर कहानियों को लिखते हैं इसके माध्यम से भी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, जीवन के संघर्ष, मूल्य एवं नैतिकता  के खोखले पन को उजागर करते हैं उन्होंने नैतिकता, धर्म, मर्यादा के खोखले पन पर तीव्र आघात  किया| उनकी कई कहानियों में व्यंग के स्वर भी दिखाई देते हैं इसके कारण कहानी की स्थूलता  समाप्त हो जाती है| और कहानी के सूक्ष्म संगठित व्यक्तित्व प्राप्त हो जाती है उनकी प्रमुख कहानियों में -कर्मफल, फूल की चोरी, आदमी का बच्चा, परदा, फूलों का कुर्ता, करवा का व्रत प्रमुख है| इस दृष्टिकोण से कहानियां लिखने वाले अन्य कहानीकार नागार्जुन, रांगे राघव, भैरव प्रसाद गुप्त प्रमुख है| रंगे राघव की कहानियां में विषय बंगाल का अकाल, देश का विभाजन, संप्रदायिकता, मजदूर की हड़ताल, बेरोजगारी, भुखमरी आती है| इन कहानियों के द्वारा वे  सामाजिक यथार्थ को ना केवल उद्घाटित करते हैं बल्कि, पाठकों में भी संघर्ष की चेतना पैदा करते हैं| इस प्रकार भैरव प्रसाद गुप्त ग्रामीण एवं शहरी परिवेश को आधार बनाकर मार्क्सवादी चेतन युक्त कहानियों को लिखते हैं| इनकी प्रमुख कहानियां सपने का अंत, सिविल लाइन का कमरा, ऐसी आजादी रोज रोज आदि  है|
     इसी काल में जैनेंद्र और इलाचंद जोशी ने मनोवैज्ञानिक यथार्थ को केंद्र में रखकर अपनी कहानियों में मानव मन को चित्रित  किया है और मानव मन की अटल गहराई में डूब कर उनके अंतः सत्य को उद्घाटित किया है| रचनाकारों पर फायड के मनोविश्लेषण बाद का प्रभाव है|इलाचंद जोशी की कहानियां फायड  की सिद्धांत का साहित्यिक रूपांतरण प्रतीत होती है| मनुष्य की वासनाओं कुंठाओं, ईर्ष्या, अहंकार इलाचंद्र जोशी के कहानी के प्रमुख विषय है| और इनके माध्यम से वे मनुष्य के असली रूप को जो मनुष्य के भीतर है, उसे उद्घाटित करने का प्रयास करते हैं| यही कारण है, कि इलाचंद्र जोशी की भाषा में व्यापक परिवर्तन दिखाई देता है क्योंकि, उनकी भाषा मनुष्य के जटिल मनोविज्ञान को प्रकट करने के कारण  दूरबोध प्रतीत होती है| और मिठास का तत्व गायब सा हो जाता है| उनकी शैली में प्रतीकात्मकता अधिक है इसकी कहानियां रोगी, परित्यक्ता, दुष्कर्मी, बदला आदि है| इनके द्वारा वर्णित पात्र मनुष्य का वह रूप है जो अत्यंत दुर्बल आत्मिक सीमित तथा कुंठित है|

प्रेमचन्द्रयुगीन कहानी

प्रेमचंदयुगीन कहानी



        प्रेमचंद हिंदी कहानी के स्तंभ माने जाते हैं| प्रेमचंद के आगमन से हिंदी कहानी को नया दशा एवं दिशा मिलती है| प्रेमचंद शुरुआती चरण में उर्दू में कहानियां लिखते हैं यह दौर 1907 का था, परंतु 1916 में उनकी कहानी "पंच परमेश्वर" सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होती है| यहीं से हिंदी कहानी की दिशा भी परिवर्तित हो जाती है| प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को रहस्य, रोमांच, कल्पना और मनोरंजन के आसमान से उतारकर धरातल के यथार्थ से जोड़ दिया| प्रेमचंद ने पहली बार हिंदी कहानी को मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक वर्णन से जुड़ा उन्होंने हिंदी कहानी में राजा और ईश्वर के स्थान पर दलित, दीन और शोषित मनुष्य को नायक के रूप में प्रस्तुत किया| वह हिंदी कथा संसार को सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक यथार्थ से परिचित करवाते हैं| प्रेमचंद पहली बार हिंदी कहानी के केंद्र में मानवीय संवेदना के सूक्ष्म पहलुओं को लाकर खड़ा कर देते हैं और यही कारण है कि हिंदी कथा साहित्य में यह काल प्रेमचंद युग के नाम से जाना जाता है| इस युग में ही पहली बार हिंदी कहानी को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्राप्त होता है| प्रेमचंद का युगबोध, यदि ध्यान से देखा जाए तो यह वह दौर है, जब भारत की राजनीति में गांधी जी का आगमन हो चुका है| भारत में सभी वर्ग स्वाधीनता की लड़ाई में खड़े हो गए हैं| सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से लोगों ने अपने शोषण का विरोध करना शुरू कर दिया है और युग का प्रभाव स्वाभाविक रूप से रचनाकार पर पड़ता है| यह वही दौर है जब वैश्विक स्तर पर प्रथम विश्व युद्ध लड़ा जाता है जिसके कारण बड़े पैमाने पर विनाश होता है| और लेखक यथार्थ और मनोविज्ञान के बीच मानवीय संवेदना को देख रहा होता है| प्रेमचंद ने अपनी आरंभिक कहानियों में गांधीजी के प्रभाव को ग्रहण किया है और इसी कारण कहानियों में शुरुआती चरण में आदर्शवादी और सुधारवादी कहानियां देखने को मिलती हैं| इन कहानियों में देशभक्ति, नैतिकता, सत्यनिष्ठा, कर्तव्य प्रणयता जैसे आदर्श देखने को मिलते हैं| इन कहानियों में प्रमुख है "नमक का दरोगा", "शतरंज के खिलाड़ी", "सत्याग्रह", "जुलूस", "बड़े घर की बेटी", "पंच परमेश्वर" आदि| प्रेमचंद अपनी कहानियों में जब दूसरे दौर की ओर चलते हैं तो उनका आदर्शवादी और सुधार वाद धीरे-धीरे जटिल यथार्थ की ओर मुड़ने लगता है| शुरुआती चरण में कहानियां अपने अंतिम चरण में युग परिवर्तन की घटना को दिखाती है लेकिन दूसरे दौर की कहानियों में क्रूर और अधिक  पैनापन होने लगता है| इन कहानियों में "सवा सेर गेहूं", "पूस की रात", "कफन", "बाबाजी का भोग", "सद्गति" जैसी कहानियां हैं| प्रेमचंद की कहानियों में सिर्फ कथानक के स्तर पर ही यथार्थ का वर्णन नहीं है, बल्कि शिल्प के स्तर पर भी यथार्थ मौजूद है| प्रेमचंद की कहानियों के कथानक में प्रेम प्रवाह, चरम सीमा में मार्मिकता, चित्रण की यथार्थता, भाषा की अभिव्यक्ति और  सादगी में पैनापन मौजूद है और शिल्प के स्तर पर भी  पैनापन देखा जा सकता है|
         प्रेमचंद का समय कहानी लेखन में 1916 से लेकर 1936 के बीच माना जाता है| उन्होंने अपने काल में लगभग 300 कहानियां लिखी हैं और यह कहानियां अपने आवरण, रूप रंग में प्रेमचंद के कथा शिल्प के क्रमिक विकास को दर्शाती है| प्रेमचंद के ही समानांतर सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखकर कई कहानीकार कहानियां लिखी हैं जैसे- विशंभर नाथ वर्मा कौशिक ने "ताई", "रक्षाबंधन", "विधवा" कहानी लिखी, सुदर्शन ने "हार की जीत", "सूरदास", "हेरा फेरी" कहानी लिखी, भगवती प्रसाद वाजपेई ने "मिठाई वाला", "निंदिया लाई" कहानी लिखी| यह कहानीकार यद्यपि प्रेमचंद के समान सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखकर कहानी लिखते थे लेकिन  इन्हें प्रेमचंद की तरह मानवीय संवेदना को उभारने में अधिक सफलता नहीं मिली, फिर भी इनकी कहानियां कलात्मक तौर पर पाठकों को प्रभावित करती हैं| इसी दौर में सरस्वती पत्रिका के समान ही इंदु पत्रिका प्रकाशित होती है इस पत्रिका में ही जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी "ग्राम" प्रकाशित होती है| जयशंकर प्रसाद के अलावा इस पत्रिका में जी. पी. श्रीवास्तव, राजा राधिका रमण प्रसाद आदि कहानीकारों की कहानियां प्रकाशित होती हैं|
       जयशंकर प्रसाद की पहचान एक कवि के रूप में अधिक है कहानीकार के रूप में कम और कवि होने के कारण उनकी कहानियों में भावुकता और काव्यात्मक ता के दर्शन होते हैं| उन्होंने अपने कहानियों के माध्यम से देश प्रेम, भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा, भारत की स्वर्णिम अतीत को पूर्ण गौरव और आदर्श के साथ प्रस्तुत किया| उन्होंने अपने कहानियों के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को भी नई चेतना प्रदान की| उनकी कहानियों में "पुरस्कार", "सिकंदर की शपथ", "चित्तौड़ का उद्धार", "सालबत्ती" प्रमुख हैं| जयशंकर प्रसाद ने प्रेम और सौंदर्य को  केंद्र में रखकर भी कहानियां लिखी हैं- "तानसेन", "गुलाम", "जहांआरा", "रसिया बालम" जैसी कहानियां महत्वपूर्ण हैं| इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद ने सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखकर "मधुवा" तथा "बिसाती" जैसी कहानियां भी लिखी हैं, किंतु उनकी कहानियों में विशेष तौर पर व्यक्तिवादी रचना दृष्टि के ही दर्शन होते हैं| वस्तुतः जयशंकर प्रसाद की धारा भाव वादी धारा है इस धारा के प्रमुख कहानीकार जयशंकर प्रसाद के अलावा चंडी प्रसाद, हृदयेश, वाचस्पति पाठक, रामकृष्ण दास, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, मोहनलाल महतो हैं|
         प्रेमचंद के युग में पांडे बेचन शर्मा उग्र की चर्चा एक ऐसे कहानीकार के रूप में होती है जिन्होंने अपनी कहानियों के द्वारा समाज के  नग्न यथार्थ को प्रस्तुत किया| नग्न यथार्थ के कारण इनके साहित्य को अश्लील साहित्य और  घासलेटी साहित्य भी कहा गया, किंतु उग्र जी ने इन सब बातों की प्रवाह ना करते हुए युगीन सामाजिक, राजनीतिक जीवन पर करारा प्रहार किया है| उनकी कहानी की भाषा भी अत्यंत धारदार और सजीव है| उन्होंने अवैध संतान वेश्यावृत्ति, व्यभिचार, विधवाओं की स्थिति जैसे विषयों को बड़े ही  बेबाकी से उठाया है| इनकी प्रमुख कहानियों में "उसकी मां", "बलात्कार", "चिंगारी", "दोजक की आग" प्रमुख हैं|

प्रारंभिक हिंदी कहानी

प्रारंभिक हिंदी कहानी

          प्रारंभिक हिंदी कहानी कौन-सी थी ?इसको लेकर इतिहासकारों में विवाद है| कुछ रचनाकारों का मानना है कि अचार्य रामचंद्र शुक्ल की 1903 में प्रकाशित कहानी "11 वर्ष का समय" हिंदी की पहली कहानी है| यह कहानी "सरस्वती पत्रिका" में प्रकाशित हुई थी| इसी प्रकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने समय की तीन कहानियों को छांटते हैं| किशोरी लाल गोस्वामी कृत "इंदुमती", "11 वर्ष का समय" और बंगमहिला द्वारा लिखित "दुलाईवाला"| इन तीनों कहानियों में से आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि यदि मार्मिकता कि दृष्टि से देखा जाए तो, यदि "इंदुमती" किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो यह हिंदी की पहली मौलिक कहानी है इसके उपरांत "11 वर्ष का समय" फिर "दुलाईवाला" का नंबर आता है| आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पश्चात हिंदी की मौलिक कहानी कौन- सी है, इसको लेकर पुन: अनुसंधान शुरू हो जाता है| कुछ विद्वानों ने "इंदुमति" को Shakespeare  के "टेंपेस्ट" की छाया मानकर उसे मौलिक कहानी के दायरे से बाहर कर देते हैं| देवी प्रसाद वर्मा ने  वर्ष 1901  में "छत्तीसगढ़ मित्र" नामक पत्रिका में छपी  माधव  सप्रे की कहानी "एक टोकरी भर मिट्टी" को हिंदी की पहली कहानी माना है| जबकि डॉ बच्चन सिंह ने किशोरी लाल गोस्वामी की ही एक कहानी  "प्रणयनी परिणय" को हिंदी की पहली कहानी माना है| यह वह दौर है जब विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी शुरू हो गया है, इस दौर में ही कई कहानियां "सरस्वती पत्रिका" में प्रकाशित होती थी सरस्वती पत्रिका में ही किशोरीलाल कृत "इंदुमती" जो कि वर्णन प्रधान है........ "आपत्तियों का पहाड़ा" जोकि स्वप्न, कल्पना एवं रोमांच से भरपूर है| कार्तिक खत्री प्रसाद द्वारा लिखित "दामोदर राम की कहानी" आत्मकथा प्रधान है, प्रकाशित होती हैं| इसी दौर में हिंदी की पहली कहानी कुछ रचनाकारों ने 1915 में प्रकाशित "उसने कहा था" को माना है| यह कहानी चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने लिखी थी मधुरेश ने लिखा है "उसने कहा था वस्तुतः हिंदी की पहली कहानी है जो कि शिल्प विधान की दृष्टि से हिंदी कहानी को एक झटके में प्रौढ़ बना देती है यह कहानी अपनी मार्मिकता और सघन गठन की दृष्टि से बेजोड़ है|" इसी दौर में कुछ कहानियां ऐसी भी प्रकाशित होती हैं जो कि अपनी संवेदना के कारण पाठकों के ह्रदय को भी  छूती है| यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि भारतेंदु के पूर्व भी कई कहानियां प्रकाशित हुई थीं, जैसे- लल्लू लाल कृत "प्रेम सागर", सदल मिश्र कृत "नासिकेतोपाख्यान", इंशा अल्लाह खान कृत "रानी केतकी की कहानी"| सरस्वती पत्रिका में भी इसी दौर में, जिसे कुछ रचनाकारों ने प्रारंभ के 2 वर्ष का समय माना है, को आरंभिक हिंदी कहानी का काल का कहा है|
         इस काल की कहानियों में कथानक  स्थूल, विवरणात्मक और रहस्य रोमांच से भरपूर था| घटनाओं में चमत्कार मौजूद होते थे| इस काल की कहानियां अपरिपक्व और शिथिल भी मानी जाती है| इस काल के अन्य कहानी कारों में जैसे- भगवान दास कृत "प्लेग की चुड़ैल", केशव प्रसाद सिंह कृत "चंद्रलोक की यात्रा", गिरिजा दत्त वाजपेई कृत "पति का पवित्र प्रेम" जैसी कहानियों में वर्णनात्मकता, स्थूलता और आकस्मिकता दिखाई देती है| यहां ध्यान देने की बात है कि इस काल के कहानीकारों की कहानियों पर प्राचीन कथा साहित्य और लोक कथा साहित्य का पर्याप्त प्रभाव दिखाई देता है| कुछ इतिहासकारों ने तो यह भी कहा है कि प्रारंभिक हिंदी कहानियों में कच्चापन मौजूद है और शिल्प की दृष्टि से भी यह बचकानी लगती है| यह कहानियां जीवन के यथार्थ से दूर हैं इनमें आदर्श और कल्पना ही मौजूद है, यह आदर्श और कल्पना व्यक्ति को सम्मोहित करती हैं, लेकिन संघर्ष के लिए प्रेरित नहीं करती|

नाटक के विकास

हिंदी साहित्य में नाटक का विकास आधुनिक काल में होता है। अंग्रेजों के आगमन के साथ ही खड़ी बोली गद्य का विकास होता है। और भारतेंदु युग से अधिक नाटक का जन्म होता है परंतु, ध्यान देने की बात है कि नाट्य लेखन एवं अभिनय की परंपरा भारत में प्राचीन काल से मौजूद है संस्कृत साहित्य में नाटकों को लिखने और उनका रंगमंच पर प्रदर्शन करने की परंपरा मौजूद था। नाटक कैसे खेला जाए, रंग सज्जा कैसे किया जाये इन सभी के विषय में निर्देश भरतमुनि के नाट्य शास्त्र से प्राप्त होता है। प्राचीन काल में अभिनय को एक विशिष्ट गुण में भी भरतमुनि ने स्थापित किया। विदेशी आक्रमणों का भी भारतीय नाटक परंपरा पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा। रंग निर्देश, अभिनय  आदि सभी पर  यवन आक्रमण के प्रभाव को देखा जा सकता है भारतीय नाटकों में आज भी युवानी का यवनिका शब्द का प्रयोग होता है। किंतु मध्य युग तक आते जाते जैसे जैसे विदेशी आक्रमण को होने लगता राज प्रसादी के साथ साथ विदेशी आक्रमणकारियों ने रंग शालाओं को भी नष्ट करना शुरू कर दिया। इसके कारण प्रेक्षा गृह एवं नाट्य प्रदर्शनों की परंपरा का भी पतन होने लगा। यज्ञवल्य और मनु ने नटो को हेय दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। और अपनी स्मृतियों में उसके प्रति हेय भावना व्यक्त किया ।इसके कारण रंग कर्मियों की सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आई और ११वी -१२वी शताब्दी तक आते-आते नाट्य परंपरा काफी हद तक हो चुकी कमजोर हो चुकी थीं ।

नाटक किसे कहते है समझाइये

हिंदी साहित्य में विधाओं को ज्ञान इंद्रियों के द्वारा ग्रहण करने के आधार पर दो रूपों में विभाजित किया जाता है  श्रव्य तथा दृश्य। ऐसी विधा जो पढ़ी या सुनी जाती है उसे श्रव्य कहते हैं, और ऐसी विधा जो देखी जाती है उसे दृश्य कही जाती है ।कहानी, उपन्यास आदि श्रव्य परंपरा में आते हैं। जबकि नाटक या रूपक  दृश्य परंपरा में गिने जाते हैं ।नाटक में दृश्य का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि  नाटक को रंगमंच पर ऐसा खेला जाता है इसमें अभिनेता का तत्व अधिक होता है वस्तुतः नाटक साहित्य की अन्य विधाओं से इस रूप में भी भिन्न होता है कि इसमें कथोपकथन भाषिक संरचना के अतिरिक्त कलाओं के अन्य रूपों का भी प्रयोग किया जाता है। नाटककार अपने नाटक में का कथोपकथन मुलक भाषा के साथ-साथ नृत्य कला, संगीत कला, वास्तुशिल्प आदि माध्यमों का भी प्रयोग कुछ इस प्रकार से करता है| कि वह नाटक के प्रदर्शन को अर्थवान बना सके इन कलाओं के प्रयोग के माध्यम से वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है|

    वस्तुतः नाटक में कथोपकथन मूलक भाषा की नाटिकता का सौंदर्य क्रियाशीलता को उसकाने में होता है। घटनाओं एवं स्थितियों का केवल वर्णन करने में नहीं होता है। वस्तुतः रंगमंच गात्थोत्यकता की नाटक का मूल बिंदु होता है। नाटक की भाषा सही रूप में कहा जाए तो हरकट की भाषा है होती है इसीलिए कालिदास ने नाट्य प्रदर्शन को चाक्षुषयज्ञ (आंख से यज्ञ) कहा है |

     नाटक में यदि अन्य गतिविधियों के तुलना में देखा जाए तो इसमें अभिनय के माध्यम से कथानक को घटित होते हुए दिखाया जाता है। नाटक में रंग सज्जा, दृश्य सज्जा, वाद्य संगीत आदि सभी का प्रयोग संप्रेषण को प्रभावी बनाने के लिए किया जाता है|

       आधुनिक काल तक आते-आते मुद्रण कला का प्रयोग अत्यधिक बढ़ने के कारण अब नाटक के ऐसे रूप भी मौजूद हैं, जो पढ़ने के लिए सुलभ हो जाते हैं। और इस कारण रूपक या नाटक की श्रेणी में कुछ ऐसी रचना भी शामिल हो गई है जो दृश्य ना हो करके श्रव्य हैं। और इनमें ध्वनि, संगीत, संवाद आदि को कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है, कि श्रोता को वह अपनी आंखों के सामने चलता हुआ सा महसूस होता है। इसे आजकल रेडियो नाटक कहा जाता है।

     रूपक का तात्पर्य है रूप का आरोप करना। दृश्य साहित्य को रूपक भी कहा जाता है इसमें अभिनेता अभिनय के माध्यम से निश्चित उद्देश्यय को प्राप्त करने का प्रयास करता है| और इसका मंचन किया जा सकता है। अतः इसे नाटक भी कहा जाता है। 

 नाटक के तत्व

    नाटक के तत्व  भारतीय परंपरा और पाश्चात्य ग्रीक परंपरा में अलग-अलग हैं |

    भारतीय परंपरा के भी दो रूप हैं :- 1.प्राचीन भारतीय परंपरा  एवं  2. आधुनिक भारतीय नाटक परंपरा|

   प्राचीन भारतीय नाटक परंपरा के अनुसार नाटक के पांच तत्व हैं :-  

1.कथानक या वस्तु :- कोई भी नाटक किसी कहानी को प्रस्तुत करता है इसे कथा वस्तु या कथानक कहा जाता है| इसे इतिवृत्त भी कहा जाता है| कोई भी कथावस्तु दो प्रकार की हो सकती है एक मुख्य कथा एवं दूसरा प्रासंगिक प्रासंगिक उदाहरण के तौर पर यदि रामायण को देखा जाए तो राम हनुमान मिलन, सीता हरण, रावण वध मुख्य कथा होंगे |जबकि इसके साथ-साथ जटायु का वध प्रासंगिक कथा की श्रेणी में गिना जाएगा|

 2. पात्र :- किसी भी नाटक में नायक, नायिका, खलनायक, विदूषक आदि अनेक पात्र होते हैं| इसमें से कुछ  मुख्य पात्र होते हैं जब कि कुछ चरित्र पात्र कहे जाते हैं 

 3.रस :- भारतीय परंपरा में नाटक के द्वारा  सौंदर्यात्मक अनुभूति की प्राप्त की बात कही गई है| जिसे रस कहा गया है वस्तुतः भारतीय परंपरा में नाटक का मूल्य उदेश सहृदय या दर्शक को रस प्राप्त कराना होता है भारतीय परंपरा में रसवादी नाटक अधिक लिखे गए हैं| यहां संघर्ष एवं तनाव का महत्त्व उतना अधिक नहीं है |

4. अभिनय:- नाटक वस्तुतः अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसका प्रदर्शन रंगमंच पर होता है। अभिनेता अपनी सारी चेष्टायें, वेशभूषा आदि के माध्यम से कथा को प्रस्तुत करता है, इसे ही अभिनय कहा जाता है। यह नाटक का अनिवार्य गुण है।

5. संगीत /गीत/नृत्य:- भारतीय नाटक परंपरा में नाटक की प्रस्तुति में अभिनय के साथ-साथ संगीत ,नृत्य, गायन, वादन आदि तत्वों का भी प्रयोग किया जाता है|

बाद में चलकर नाटक में समय के अनुरूप कई बदलाव आते हैं विशेषकर अंग्रेजों के आगमन के पश्चात भारत में आधुनिक नाटकों का जन्म होता है भारतीय परंपरा में समय के अनुकूल कुछ परिवर्तन करके आधुनिक नाटक का जन्म होता है और इसमें निम्नलिखित सार तत्व है 1.कथावस्तु:- आधुनिक नाटकों में भी एक निश्चित कथानक के इर्द-गिर्द नाटकों को लिखा जाता है आधुनिक नाटक कथानक के आधार पर ऐतिहासिक, धार्मिक, पौराणिक, सामाजिक, काल्पनिक कई प्रकार के हो सकते हैं| प्राचीन नाट्य परंपरा में कथानक के विकास की पांच अवस्थाएं मानी गई है-  प्रारंभ, यत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति,फलागम परंतु आधुनिक नाटकों में प्रतिपय बदलाव के साथ कथानक के विकास में चार स्थितियां बदलाई गई  आरंभ, विकास, संघर्ष, चरम सीमा। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि आधुनिक नाटकों में अब समय के साथ कुछ परिवर्तन भी होते रहे हैं और कथानक के विकास में भी परिवर्तन दिखाई देते हैं।

2.पात्र:- कोई भी नाटक बिना पात्र के नहीं हो सकता है नाटकों में नायक, खलनायक, नायिका आदि अनेक पात्र होते हैं |

3.संवाद :- कोई भी नाटक में पात्र या चरित्र पात्र आपस में संवाद करते हैं और बातचीत या संवाद से ही नाटक आगे बढ़ती है| संवाद दो प्रकार के होते हैं प्रथम स्गवत द्वितीय प्रकट। प्रकट कथन का आशय है कि कोई पात्र अपनी बातों को जब कहता है तो इसे संबंधित पात्र के साथ-साथ अन्य पात्र भी सुनते हैं। जबकि स्वगत कथन का अर्थ है कि कोई पात्र अपने मन में जो कुछ भी सोचता है उसे पात्र के मुंह से कहा कहवा या करवाया जाता है परंतु यह मानक कर चला जाता है कि स्वागत कथन को दर्शक सुन रहा है। किंतु, अन्य पात्र नहीं सुन रहा है।

4. देश /काल/ वातावरण:- कोई भी नाटक जिस भी कथावस्तु को प्रकट करना चाहता है| उसी के अनुसार देश, काल तथा वातावरण का चित्रण नाटककार को करना चाहिए| नाटककार वेशभूषा, संवाद रंग सजा आदि के द्वारा इस चित्रों को प्रस्तुत करता है, देश/ काल वातावरण और उनके अनुसार वर्णन करने पर नाटक अधिक प्रभावी होता है|

5. भाषा शैली:- नाटक के संवाद किसी न किसी भाषा में होते हैं| इसके माध्यम से पत्रों की वर्गीय स्थिति का भी ज्ञान होता है| वस्तुतः नाटक में भाषा देश, काल तथा वातावरण के अनुरूप होनी चाहिए |

6.उद्देश्य:- नाटक में कई बार यह आवश्यक हो जाता है कि यह समाज के लिए कोई निश्चित उद्देश्य की पूर्ति करें क्योंकि, नाटक का मंचन सामूहिक रूप से भी होता है |नाटककार का अपने नाटक के माध्यम से या तो जनता का मनोरंजन करना चाहता है या संदेश देना चाहता है या किसी स्थिति विशेष के संदर्भ में लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता है। या किसी समस्या को उठाना चाहता है इस प्रकार नाटक का एक निश्चित उदेश भी होता है ।

7.रंग निर्देश:-  नाटककार अभिनेता के लिए नाटक के प्रस्तुति के लिए कब क्या करना है| इसके विषय में निर्देश देता है इसे रंग निर्देश कहा जाता है|

  पाश्चात्य नाटक परंपरा ग्रीक परंपरा से प्रभावित है और इसे नाटक में 6 तत्व माने गए हैं कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकल, उद्देश्य और शैली आदि।

  नाटक का विभाजन अंकों एवं दृश्य में होता है कुछ नाटकों में विभाजन के लिए उनको को आधार बनाया जाता है यदि किसी नाटक में एक अंकों होगा तो उसे एकांकी कहा जाता है एक से अधिक अंक होगा उसे अनेकांगी नाटक कहा जाता है। एकांकी नाटक का विभाजन दृश्यों में किया जाता है अर्थात कथा तो एक ही होगी लेकिन इसमें दृश्य कई होंगे। एकांकी नाटक आधुनिक काल तक आते-आते एक स्वतंत्र विधा बन चुकी है। एकांकी नाटक में जीवन की किसी एक घटना या एक समस्या से संबंधित प्रशन प्रसंग प्रस्तुत किया जाता है।

  एकांकी नाटक एवं पूर्ण नाटकों में यह अंतर होता है कि एकांकी नाटक में एक अंक का होता है जबकि पूर्ण नाटक में एक से अधिक अंक हो सकते हैं एकांकी में पूर्ण नाटक की तुलना में पत्रों की संख्या भी कम होती है।नाटक की तुलना में एकांकी में घटनाएं की विविधता अधिक नहीं होती। वस्तुत एकांकी में किसी एक घटना या प्रसंग को ही इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है ताकि वह प्रभाव उत्पन्न कर सके।

 कुछ अन्य नाटक

 गीती नाटक:-  जब नाटक को नाटक के संवाद गीतों के रूप में होते हैं और इसमें ध्वनि तत्व संगीतात्मक और काव्यात्मक तत्व की प्रधानता होती है, तो इसे गीत नाटक कहते हैं। जैसे जयशंकर प्रसाद की करुणालय 

काव्य नाटक :- यह नाटक भी गीती नाटक के समान होता है। और इसमें संवाद पद या कविता में रहता है लेकिन इसमें संगीत तत्व की प्रधानता कम रहती है। जैसे धर्मवीर भारती का अंधा युग 

रेडियो नाटक:- यह आधुनिक काल की एक नई विधा है इसमें दृश्य तत्व का अभाव रहता है इसमें संवादों को विभिन्न प्रकार की पाश्व ध्वनि साथ कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है। कि सुनने वाला विभिन्न दृश्य की कल्पना कर लेता है। जैसे भगवतीचरण भावना का नाटक तारा ध्वनि का प्रधानता होने के कारण ही इसे ध्वनि रूप भी कहते हैं।

 नृत्य संगीत काव्य रूपक :- इसे बैले भी कहा जाता है इसमें सभी संवादों को एक परदे के पीछे से प्रस्तुत किया जाता है। यह संवाद कविता या गीतों के रूप में होता है और पर्दे के दूसरी तरफ कुछ प्रस्तुतियां की जाती है।

पत्र लेखन किसे कहते है


पत्र लेखन, लेखन की एक साहित्य  की नई  विधा है| इसके अंतर्गत एक व्यक्ति द्वारा लिखे गए पत्र को प्रकाशित किया जाता है| एक व्यक्ति जब दूसरे व्यक्ति को पत्र लिखता है तो वह बिना दुराव के अपने मन की बात को खोल कर लिखता है| इन पत्रों को जब वह लिख रहा होता है तो यह भी होता है, कि वह इसे सार्वजनिक रूप से छपवाने के इरादे से ना लिख रहा है, परंतु वह व्यक्ति भविष्य में इतना महत्वपूर्ण हो जाता है, कि उसका पत्र साहित्य संसार के लिए मूल्यवान धरोहर बन जाते हैं| साहित्य के द्वारा व्यक्ति के निजी अनुभव, प्रतिक्रिया और किसी व्यक्ति विशेष पर उसके विचार को काफी हद तक जाना जा सकता है| कई बार यह पत्र किसी ऐसी घटना के विषय में भी महत्वपूर्ण जानकारी का स्रोत बन जाता है जैसे- भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जेल में थे तो, अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को ज्ञान देने के लिए अनेक पत्र लिखें| इन पत्रों को एक पुस्तक के रूप में "पिता के पत्र पुत्री के नाम" से प्रकाशित किया गया| कई बार पत्र विभिन्न साहित्यकारों के बीच में संवाद के रूप में चलता रहता है| और बाद में चलकर इन पत्रों का संपादन एक दूसरा साहित्यकार संकलन करके दूसरे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करता है| जैसे- पदम सिंह शर्मा के पत्रों का संपादन बनारसीदास चतुर्वेदी ने किया है| केदारनाथ अग्रवाल और राम विलास शर्मा के एक दूसरे को लिखे गए पत्र "मित्र संवाद" के नाम से प्रकाशित हुए हैं| इसी प्रकार विवेकानंद के पत्रों का संकलन "विवेकानंद पत्रावली" के नाम से प्रकाशित किया गया है|






डायरी किसे कहते है


डायरी में रोज के अनुभवों, घटनाओं और प्रतिक्रियाओं को कोई लेखक जब लिखता है तो उसे डायरी नामक विधा का जन्म होता है| इस विधान में संस्मरण ,रेखाचित्र,निबंध,यात्रा-वृतांत आदि सभी अनुभव एक साथ घुलमिल जाते हैं|डायरी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति होती है, किंतु जब डायरी को प्रकाशित कर दी जाती है तो वह सामान्य पाठक के लिए भी उपलब्ध हो जाता है|और इससे निजीपन समाप्त हो जाती है| और साहित्य संसार की एक संपत्ति बन जाती है |कोई भी डायरी कितनी अधिक लोकप्रिय है,यह लेखक की महानता या लोकप्रियता पर निर्भर होता है, यदि किसी व्यक्ति विशेष के निजी जीवन में झांकना हो तो उसकी डायरी के पन्ने सबसे महत्वपूर्ण  साबित होती है|डायरी के सिर्फ तिथि क्रम का ही उल्लेख नहीं करते हैं बल्कि यह एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से हम व्यक्ति विशेष के निजी अनुभव, उसकी प्रतिक्रियाओं और उसकी रुचियां से भी अवगत हो सकते हैं | लेखक की अनुभूतियों की छाप डायरी मे सदैव बनी होती है |स्वतंत्र रूप से डायरी साहित्य की रचना हिंदी में अधिक मात्रा में नहीं हुई है| इसकी संख्या अन्य स्वतंत्र विधाओं की अपेक्षा कम है| घनश्याम दास बिड़ला का प्रकाशन "डायरी के पन्ने" नाम से हुआ इसी प्रकार धीरेंद्र वर्मा की "मेरी कॉलेज की डायरी" से साहित्यिक जीवन के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं मिलती है| मुक्तिबोध की रचना एक "साहित्य डायरी "में लेखक के संघर्ष और तनाव को देखा जा सकता है| मोहन राकेश की डायरी में उनके जीवन संघर्ष को देखा जा सकता है |

साक्षात्कार क्या है

साक्षात्कार को अंग्रेजी में इंटरव्यू कहा जाता है |और साक्षात्कार भी हिंदी साहित्य की एक नवीन गध विधा है|इसका एक अन्य नाम  भेंट वार्ता भी है| यह भी पत्रकारिता से जुड़ी है, पर समय के साथ  साहित्य में भी अपना स्थान बना लिया है| किसी व्यक्ति विशेष से उसकी जीवनी या उसे कला ,संस्कृति ,संगीत ,रचना या उसकी खुद के द्वारा किए गए कार्य पर किया गया बातचीत साक्षात्कार है| साक्षात्कार में पाठक साक्षात्कार के माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष से तर्क,अनुभव या विचार से जुड़ जाता है| संवाद शैली पर आधारित होने के कारण इसमें संप्रेषण का संभावना अधिक होती है|इस विधा का शुरुआत भारतेंदु युग से हो जाता है| राधाचरण गोस्वामी ने भारतेंदु से कुछ प्रश्न पूछे और उन प्रश्नों के उत्तर को प्रकाशित किया गया था बनारसी दास चतुर्वेदी द्वारा लिए गए दो साक्षात्कार रत्नाकर जी के साथ "बातचीत"और प्रेमचंद के साथ "दो दिन" विशाल भारत नाम पत्रिका में प्रकाशित हुए थे|प्रभाकर माधवे ने जैनेंद्र कुमार तथा रामचंद्र शुक्ल के साक्षात्कार लिए और यह साक्षात्कार जैनेंद्र की विचार नामक पुस्तक से प्रकाशित की गई| इसी पुस्तक में श्रीकांत शर्मा ने महत्वपूर्ण कवि या साहित्यकारों के जो साक्षात्कार लिए वे २० वी शताब्दी के अंधेरे में संकलित है| नामवर सिंह और रामविलास शर्मा के साक्षात्कार भी विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे |

यात्रा वृतांत किसे कहते है


यह साहित्य की वह विधा है जिसमें लेखक किसी स्थान की यात्रा का वर्णन करता है |और यह वर्णन रोचक होता है| वर्णन के दौरान लेखक किसी स्थान के इतिहास,भूगोल, संस्कृति, अर्थव्यवस्था आदि से पाठक को परिचित कराया जाता है| यात्रा वृतांत मे संस्मरण और रेखाचित्र का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है|किसी भी यायावर( घूमने वाला व्यक्ति ) के अनुभव में विविधता होती है यात्रा वृतांत में यायावर के अनुभव की व्याख्या नहीं होती है, बल्कि निश्चित दृष्टिकोण से दर्शनीय स्थानों को देखा जाता है|एक यात्री उन समस्त बिंदुओं को उल्लास और ऊर्जा के भाव से देखने का प्रयास करता है , जहां पर वह यात्रा के दौरान गया होता है|यात्रा वृतांत की दो खूबियां होती है- एक तो सौंदर्य का बोध और दूसरा कौतूहल को जगाए रखना|देश काल के संदर्भ में किसी भी पाठक की जानकारी को बढ़ाना यात्रा वृतांत का प्रमुख उद्देश्य होता है |
     हिंदी में यात्रा वृतांत एक आधुनिक गध विधा के रूप में स्वीकृत है| भारतेंदु युग में स्वयं भारतेंदु ने विभिन्न स्थलों की यात्रा की और अपने अनुभवों को साझा किया|जैसे- यात्रा वृतांत के रूप में उनके कुछ संस्मरण है- सरयू पार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा, हरिद्वार की यात्रा|भारतेंदु युग में ही कुछ लेखकों  के द्वारा विदेश यात्रा के वृतांत भी लिखे गए|इसी प्रकार द्विवेदी युग में भी विभिन्न यात्रा वृतांत लिखे गए श्रीधर पाठक की देहरादून ,शिमला यात्रा |स्वामी सत्यदेव परिव्राजक की "मेरी कैलाश यात्रा" अमेरिका भ्रमण आदि |सबसे महत्वपूर्ण यात्रा वृतांत लेखक राहुल सांकृत्यायन माने जाते हैं उन्होंने विभिन्न देशों की यात्रा की ओर यात्रा में आने वाली कहानियों को बताने के साथ-साथ उस स्थान विशेष कि प्राकृतिक संपदा , सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक घटनाओं को भी बारी बारी से प्रस्तुत किया जैसे-किन्नर देश में, दार्जिलिंग परिचय, यात्रा के पन्ने आदि|बाद में चलकर अज्ञेय ने अपनी यात्रा वृतांत के द्वारा विदेशी अनुभवों को भी एक भी एक कहानीकार की रोचकता और यात्री के रोमांचक के साथ प्रस्तुत किया है|"एक बूंद सहसा उछली" में यूरोप और अमेरिका की यात्राओं को प्रस्तुत किया है|मोहन राकेश ने अपनी यात्रा वृतांत "आखिरी चट्टान" में दक्षिण भारत की यात्राओं का वर्णन किया है|निर्मल वर्मा ने" चिडो पर चांदनी" नामक यात्रा वृतांत  में अपने यूरोप यात्रा का वर्णन किया है|इस यात्रा वृतांग में वे  वहां की इतिहास, दर्शन और संस्कृति से सीधा संवाद करते हैं|उनके यात्रा में संवेदनशीलता के साथ साथ बौद्धिक गहराई का भी अनुभव होता है |

आलोचना को परिभाषित करें

 आलोचना का तात्पर्य है, किसी वस्तु, रचना या कृति का मूल्यांकन करना| किसी भी रचना को समझने के लिए आलोचना को समझना आवश्यक है| बिना आलोचना...